शीतला सप्तमी 2018: जानें क्या है शीतला माता की पूजा से लाभ और क्या है पौराणिक मान्यताएं

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New Delhi: हिन्दुओं का शीतला सप्तमी (Sheetla Saptami 2019) एक महत्वपूर्ण पर्व है, इसमें शीतला माता का व्रत और पूजन का विधान है। शीतला सप्तमी होली के सम्पन्न होने के कुछ दिन बाद मनायी जाती है। इस बार शीतला सप्तमी का व्रत 27 मार्च को है। यह पर्व कुछ जगहों पर अष्टमी तिथि के दिन भी मनाया जाता है, जिसे शीतला अष्टमी के नाम से जाना जाता है।
बसौड़ा के नाम से भी मशहूर है यह पर्व

शीतला मां की पूजा अर्चना चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को की जाती है और पूजा के बाद बासी ठंडा खाना ही माता को भोग लगाया जाता है जिसे बसौडा कहा जाता है। पूरे उत्तर भारत में शीतला सप्तमी (Sheetla Saptami 2019) का त्योहार, बसौड़ा के नाम से भी मशहूर है। इस दिन वही बासी भोजन प्रसाद के रूप में खाया जाता है।

मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी भोजन खाना बंद कर दिया जाता है। यह त्योहार शीतला मां को प्रसन्न करने के लिए होता है ताकि गर्मी के दिनों में पैदा होने वाली बिमा’रियों से घर की रक्षा की जा सके। मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से दा’हज्वर, पीत’ज्वर, चेच’क, दुर्गन्ध’युक्त फो’डे, नेत्र विका’र आदि रो’ग भी दूर होते हैं।

व्रत का महत्व

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ के कृष्ण पक्ष की सप्तमी शीतला देवी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होती है। इसलिए यह दिन शीतला सप्तमी के नाम से विख्यात है। आज के समय में शीतला माता की पूजा स्वच्छता की प्रेरणा देने के कारण महत्वपूर्ण है।

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इस दिन खाया जाता है बासी खाना

शीतला माता की पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख देते हैं। फिर दूसरे दिन प्रात:काल महिलाओं द्वारा शीतला माता का पूजन करने के बाद माता को भी बासी यानी ठंडे भोजन का ही भोग लगाया जाता है और घर के सभी व्यक्ति भी बासी भोजन ही खाते हैं। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता, ताजा खाना अगली सुबह से ही किया जाता है।

माता का स्वरूप

शीतला स्तोत्र में शीतला मां का जो स्वरूप बताया गया है, उसमें मां रोगी के लिए बहुत मददगार हैं। इसमें कहा गया है कि शीतला दिगम्बरा हैं, गर्दभ पर सवार रहती हैं। सूप (छाज) झाड़ (माजर्नी) और नीम के पत्तों से अलंकृत हैं और हाथ में शीतल जलघट उठाए हुए हैं।

पौराणिक उल्लेख

शीतला सप्तमी व्रत का उल्लेख पुराणों में मिलता है, जिसमें बासी भोजन किया जाता है। शीतला माता का मंदिर वट वृक्ष के समीप ही होता है। शीतला माता के पूजन के बाद वट का पूजन भी किया जाता है, बिना वट के पूजन के यह पूजा अधूरी मानी जाती है। मान्यता है कि जिस घर की महिलाएं शुद्ध मन से इस व्रत को करती हैं, उस परिवार को शीतला देवी धन-धान्य से पूर्ण करती हैं साथ में नकारात्मक ऊर्जा और प्राकृतिक विप’दाओं से दूर रखती हैं।