शीतला सप्तमी 2019: जानें पूजन का शुभ मुहूर्त, विधि, महत्व और कथा

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New Delhi: हर साल होली के सातवें दिन शीतला सप्तमी (Sheetla Saptami) मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं सुबह अंधेरे में रात के बने मीठे चावल, हल्दी, चने की दाल और लोटे में पानी लेकर होलिका दहन वाली जगह पर जाकर पूजा करती हैं।

शीतला सप्तमी (Sheetla Saptami) को उत्तर भारत के कई जगहों पर बासौड़ा या बसोरा (Basoda) भी कहा जाता है। इस बार बासौड़ा या शीतला सप्तमी 27 मार्च को मनाई जा रही है। जानिए इस पूजा से जुड़ी सभी खास बातें…

शीतला सप्तमी का शुभ मुहूर्त

27 मार्च सुबह 06:28 से 18:37 तक।

चावल का प्रसाद

शीतला सप्तमी के दिन शीतला माता की पूजा के समय उन्हें खास मीठे चावलों का भोग चढ़ाया जाता है। ये चावल गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं। इन्हें पूजा से पहले रात में बनाया जाता है। इसी प्रसाद को घर में सभी सदस्यों को खिलाया जाता है। इस दिन घर में सुबह के समय कुछ और नहीं बनता।

शीतला सप्तमी की पूजा विधि

हर पूजा की तरह इसमें भी सुबह पहले स्नान करें। इसके बाद शीतला माता की पूजा करें। स्नान और पूजा के वक्त ‘हृं श्रीं शीतलायै नमः’ का उच्चारण करते रहें। माता को भोग में रात के बने गुड़ वाले चावल चढ़ाएं। व्रत में इन्हीं चावलों को खाएं।

शीतला सप्तमी का महत्व

मान्यता है कि शीतला माता ये व्रत रखने से बच्चों की सेहत अच्छी बनी रहती है। उन्हें किसी भी प्रकार का बुखार, आंखों के रोग और ठंड से होने वाली बीमारियां नहीं होती। इसके अलावा यह भी माना जाता है शीतला सप्तमी के बाद बासी भोजन नहीं किया जाता है। यह बासी भोजन का खाने का आखिरी दिन होता है। इसके बाद मौसम गर्म होता है इसीलिए ताज़ा खाना खाया जाता है।

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शीतला सप्तमी की कथा

हिंदू धर्म में प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक दिन बूढ़ी औरत और उसकी दो बहुओं ने शीतला माता का व्रत रखा। मान्यता के मुताबिक इस व्रत में बासी चावल चढ़ाए और खाए जाते हैं। लेकिन दोनों बहुओं ने सुबह ताज़ा खाना बना लिया। क्योंकि हाल ही में दोनों की संताने हुई थीं, इस वजह से दोनों को डर था कि बासी खाना उन्हें नुकसान ना पहुंचाए। सास को ताज़े खाने के बारे में पता चला तो वो बहुत नाराज़ हुई। कुछ क्षण ही गुज़रे थे, कि पता चला कि दोनों बहुओं की संतानों की अचानक मृत्यु हो गई। इस बात को जान सास ने दोनों बहुओं को घर से बाहर निकाल दिया।

शवों को लेकर दोनों बहुएं घर से निकल गईं। बीच रास्ते वो विश्राम के लिए रूकीं। वहां उन दोनों को दो बहनें ओरी और शीतला मिली। दोनों ही अपने सिर में जूंओं से परेशान थी। उन बहुओं को दोनों बहनों को ऐसे देख दया आई और वो दोनों के सिर को साफ करने लगीं। कुछ देर बाद दोनों बहनों को आराम मिला, आराम मिलते ही दोनों ने उन्हें आशार्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी गोद हरी हो जाए।

ये बात सुन दोनों बुरी तरह रोने लगीं और उन्होंने महिला को अपने बच्चों के शव दिखाए। ये सब देख शीतला ने दोनों से कहा कि उन्हें उनके कर्मों का फल मिला है। ये बात सुन वो समझ गईं कि शीतला सप्तमी के दिन ताज़ा खाना बनाने की वजह से ऐसा हुआ।

ये सब जान दोनों ने माता शीतला से माफी मांगी और आगे से ऐसा ना करने को कहा। इसके बाद माता ने दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया। इस दिन के बाद से पूरे गांव में शीतला माता का व्रत धूमधाम से मनाए जाने लगा।